मनुष्य जीवन अनमोल है। उसे लोग सुख की खोज में लगा रहे हैं और सुख को धन में खोज रहे हैं। धन अर्जित करने के लिए लोग पाप करने से भी नहीं चूकते। जहां तक मनुष्य की चलती है, वह धन अर्जित करने के लिए साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल कर रहा है। धन से केवल साधन मिल सकता है शांति नहीं। अगर इस अनमोल जीवन में शांति प्राप्त करनी है, तो सबसे पहले जीव के अंदर परमात्मा का दर्शन करें। जीवों पर दया करें और दीन-दुखियों की सेवा करें। मानव हित से जुडे कायरें में खुद को लगाएं। वही जीवन का सबसे बडा धन है। इंसान आज धन की चाह में मां- बाप, भाई और अन्य नाते रिश्तेदारों को भूलता जा रहा है। क्षणिक सुख के लिए वह नास्तिक बन रहा है। वह यह नहीं सोच रहा है कि जीवन का आनंद धन में नहीं, मां-बाप की सेवा में है। इस धरती पर मां-बाप साकार भगवान हैं। यह बात तब समझ में आती है, जब इंसान खुद बूढा होता है। उसे तब अपनी गलती का अहसास होता है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए कहा गया है बोए पेड बबूल का तो आम कहां से पाय
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