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Thursday, January 27, 2011

मैं तो ठहर गया, पर तू कब ठहरेगा!


कहा जाता है कि जीवन चलने का नाम है अत:चलते रहो। चरैवेति,चरैवेति।चलना, निरंतर आगे बढना ही जीवन है, रुकना या पीछे हटना मृत्यु है। लेकिन निरंतर चलते रहने के लिए, आगे बढते रहने के लिए एक चीज और भी जरूरी है-रुकना। निरंतर चलते रहने के लिए रुकना, विश्राम करना या ठहरना भी अनिवार्य है।
चलना वस्तुत:दो प्रकार का होता है। एक शरीर का चलना या गति करना और दूसरा मन का चलना या गति करना। मन, जो शरीर को चलाता है, उसे नियंत्रित करता है आध्यात्मिक दृष्टि से उसकी गति को नियंत्रित करना भी अनिवार्य है। एक रुकने का अर्थ भौतिक शरीर की गति अर्थात कर्म से मुंह मोडना है लेकिन दूसरे रुकने का अर्थ मन की गति को विराम देना है। मन जो अत्यंत चंचल है, उसको नियंत्रित करना है। जब मन रुक जाता है, तो वह शांत-स्थिर होकर पुनर्निर्माण में सहायक होता है। जब मन तेज भागता है अथवा गलत दिशा में दौडता है, तो ठहराव की जरूरत होती है। कीचड युक्त पानी जब स्थिर हो जाता है, तो उसमें घुली मिट्टी नीचे बैठ जाती है और स्वच्छ पानी ऊपर तैरने लगता है। मन को रोकने पर भी यही होता है। विचारों का परिमार्जन होने लगता है। कार्य करता है हमारा शरीर, लेकिन उसे चलाता है हमारा मस्तिष्क और मस्तिष्क को चलाने वाला है हमारा मन। शरीर को सही गति प्रदान करने के लिए मन को रोकना और उसे सकारात्मकताप्रदान करना अनिवार्य है। जब बुद्ध और अंगुलिमालका आमना-सामना हुआ, तो दोनों तरफ से ठहरने की बात होती है। अंगुलिमालकडककर बुद्ध से कहता है, ठहर जा। बुद्ध अत्यंत शांत भाव से कहते हैं, मैं तो ठहर गया हूं, पर तू कब ठहरेगा? एक आश्चर्य घटित होता है। बुद्ध की शांत मुद्रा सारे परिवेश को शांत-स्थिर कर देती है। उस असीम शान्ति में अंगुलिमालभी आप्लावित हो जाता है। वह ठहर जाता है और दस्युवृत्ति त्याग कर बुद्ध की शरण में आ जाता है। मन की हिंसक वृत्ति का विनाश होने का प्रारंभ ही वास्तविक ठहराव है। जब व्यक्ति पूर्ण रूप से ठहर जाता है, उसके मन से उद्विग्नता तथा द्वंद्व मिट जाता है तभी समता का उदय होता है। मन के ठहराव का अर्थ है नकारात्मक भावों के स्थान पर सकारात्मक भावों का उदय। सकारात्मक भावों के उदय के साथ ही व्यक्ति आनंद के साम्राज्य में प्रवेश करता है।
आनंद के लिए जीवन की गति तथा विचारों के प्रवाह को नियंत्रित कर उन्हें संतुलित करना जरूरी है। यही आध्यात्मिकता है। यही वास्तविक आनंद अथवा परमानंद है।

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