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Monday, January 24, 2011

जीवन का सच

जब हम तमाम व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करते हैं तो हमें इस बात का ज्ञान होता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी पहचान, अस्तित्व की सूचना समाज को देना चाहता है। हर इंसान पहचान बनाने के लिए एक दिशा तय करता है, लेकिन कई बार इस दिशा को तय करने में इसकीवैज्ञानिकता को समझने का प्रयास नहीं करता है। नतीजन वह दिशाहीन होकर भटक जाता है, क्योंकि चाहने वालों की यहां कमी नहीं है।
प्रत्येक व्यक्ति के पास उसकी असीमित इच्छाएं हैं, जिसे वह पूरा करना चाहता है, लेकिन उसे पता नहीं कि किस मार्ग का अनुकरण कर सफलता प्राप्त की जा सकती है और किस पर असफलता हाथ लग सकती है। मेरा मानना हैं कि जीवन का जो निर्णय हो, वह वैधानिक और वैज्ञानिक हो। तभी वह जीवन सार्थक हो सकता है। धर्म क्षेत्र में देखें। धर्म के क्षेत्र में लोग इसलिए जाना चाहते हैं कि उनके पूर्वजों ने घोषणा कर रखी है, इस संसार की जो विकरालता एवं संकट है, उनसे हटकर एक ऐसा मार्ग हमारे जीवन में है जिसे अध्यात्म के नाम से जानते हैं। अध्यात्म के मार्ग में जाने का मतलब हुआ कि वह व्यक्ति अपना सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर देता है। इससे उस व्यक्ति की जवाबदेही समाप्त हो जाती है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि सर्वधर्मान् परितज्य, मामेकं शरणं ब्रज। अर्थात् तुम सारे विवादों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। क्या संभव है कि परमात्मा की शरण में आने के लिए कोई व्यक्ति अपने अहंकार और ऊंचाई को छोटा कर, सम बनकर खड़ा हो जाए। विकार तो व्यक्ति के मन में होता है और मनुष्य वहां तक नहीं पहुंच पाता। सुप्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद से एक बार पूछा गया कि जीवन की परिभाषा क्या है? उन्होंने बडे़ अद्भुत तरीके से कहा, 'ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न हो, इच्छा क्या पूरी हो मन की। एक दूसरे से न मिल सके, यह विडंबना है जीवन की।' समाज के किसी भी क्षेत्र में देखें, किसी व्यक्ति से पूछें कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है? उसका एक ही जवाब होगा कि सुख में रहना और खूब धन, 

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