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Thursday, January 27, 2011

मैं तो ठहर गया, पर तू कब ठहरेगा!


कहा जाता है कि जीवन चलने का नाम है अत:चलते रहो। चरैवेति,चरैवेति।चलना, निरंतर आगे बढना ही जीवन है, रुकना या पीछे हटना मृत्यु है। लेकिन निरंतर चलते रहने के लिए, आगे बढते रहने के लिए एक चीज और भी जरूरी है-रुकना। निरंतर चलते रहने के लिए रुकना, विश्राम करना या ठहरना भी अनिवार्य है।
चलना वस्तुत:दो प्रकार का होता है। एक शरीर का चलना या गति करना और दूसरा मन का चलना या गति करना। मन, जो शरीर को चलाता है, उसे नियंत्रित करता है आध्यात्मिक दृष्टि से उसकी गति को नियंत्रित करना भी अनिवार्य है। एक रुकने का अर्थ भौतिक शरीर की गति अर्थात कर्म से मुंह मोडना है लेकिन दूसरे रुकने का अर्थ मन की गति को विराम देना है। मन जो अत्यंत चंचल है, उसको नियंत्रित करना है। जब मन रुक जाता है, तो वह शांत-स्थिर होकर पुनर्निर्माण में सहायक होता है। जब मन तेज भागता है अथवा गलत दिशा में दौडता है, तो ठहराव की जरूरत होती है। कीचड युक्त पानी जब स्थिर हो जाता है, तो उसमें घुली मिट्टी नीचे बैठ जाती है और स्वच्छ पानी ऊपर तैरने लगता है। मन को रोकने पर भी यही होता है। विचारों का परिमार्जन होने लगता है। कार्य करता है हमारा शरीर, लेकिन उसे चलाता है हमारा मस्तिष्क और मस्तिष्क को चलाने वाला है हमारा मन। शरीर को सही गति प्रदान करने के लिए मन को रोकना और उसे सकारात्मकताप्रदान करना अनिवार्य है। जब बुद्ध और अंगुलिमालका आमना-सामना हुआ, तो दोनों तरफ से ठहरने की बात होती है। अंगुलिमालकडककर बुद्ध से कहता है, ठहर जा। बुद्ध अत्यंत शांत भाव से कहते हैं, मैं तो ठहर गया हूं, पर तू कब ठहरेगा? एक आश्चर्य घटित होता है। बुद्ध की शांत मुद्रा सारे परिवेश को शांत-स्थिर कर देती है। उस असीम शान्ति में अंगुलिमालभी आप्लावित हो जाता है। वह ठहर जाता है और दस्युवृत्ति त्याग कर बुद्ध की शरण में आ जाता है। मन की हिंसक वृत्ति का विनाश होने का प्रारंभ ही वास्तविक ठहराव है। जब व्यक्ति पूर्ण रूप से ठहर जाता है, उसके मन से उद्विग्नता तथा द्वंद्व मिट जाता है तभी समता का उदय होता है। मन के ठहराव का अर्थ है नकारात्मक भावों के स्थान पर सकारात्मक भावों का उदय। सकारात्मक भावों के उदय के साथ ही व्यक्ति आनंद के साम्राज्य में प्रवेश करता है।
आनंद के लिए जीवन की गति तथा विचारों के प्रवाह को नियंत्रित कर उन्हें संतुलित करना जरूरी है। यही आध्यात्मिकता है। यही वास्तविक आनंद अथवा परमानंद है।

Wednesday, January 26, 2011

Tuesday, January 25, 2011

Freedom is not worth having if it does not include the freedom to make mistakes.

happy-republic-day-Wallpaper

Happy republic day

happy republic day wallpaperRepublic Day is celebrated with much enthusiasm athwart the country and mainly in the capital New Delhi where the celebrations begin with the president to the nation. This day is celebrated in January 26. And this day is declared a national holiday.
The beginning of the event is always a sober reminder of the sacrifices of the martyrs who died for the country in the freedom movement and the following wars in defense of the autonomy of their country.
This year have the Indonesian President Susilo Bambang Yudhoyono as the Chief Guest. Usually the chief guests are invited from countries with whom India favour special relationship.
Here, some inspires Happy Republic Day 2011 SMS, messages, wallpapers, greetings and quotes to express the feeling of proud to be Indian:
“Aao Desh ka samman kare
shahido ki shahidat kare
Ek bar fir rastra ki kaman
hum Hindustani apne haaton me dhare
Aao swantrata diwas ka samaan kare.”
Azad bharat k nikamo
kal agar dipawali ya new year hota to aaj sms ki line laga dete
Ab kam band karo aur sabko msg karo
happy republic day Chak de India
Freedom in Mind
Faith in Words
Pride in our Heart
Memories in our Souls
Lets Salute the Nation on
REPUBLIC DAY
Expansion of INDIA
I – INDIAN
N – NOT
D – DELAY
I – IN
A – ACTION
Happy Republic Dayhappy republic day wallpaper
We would similar to to wish Happy Republic Day to all Indians around the world. If you have some wishes to give to your Family and Friends. Happy Republic Day 2011!

Happy republic day

Tairna hai to samandar me tairo,
nadi naalon me kya rakha hai,
Pyar karna hai to watan se karo...
in bewafa ladkion me kya rakha hai 

Gandhi swapna

Gandhi swapna jab satya bana,
Desh tabhi jab gantantra bana,
Aaj fir sae yaad kare woh mehnat,
Jo thi ki veero ne,aur bharat gantantra bana.

Monday, January 24, 2011

जीवन का सच

जब हम तमाम व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करते हैं तो हमें इस बात का ज्ञान होता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी पहचान, अस्तित्व की सूचना समाज को देना चाहता है। हर इंसान पहचान बनाने के लिए एक दिशा तय करता है, लेकिन कई बार इस दिशा को तय करने में इसकीवैज्ञानिकता को समझने का प्रयास नहीं करता है। नतीजन वह दिशाहीन होकर भटक जाता है, क्योंकि चाहने वालों की यहां कमी नहीं है।
प्रत्येक व्यक्ति के पास उसकी असीमित इच्छाएं हैं, जिसे वह पूरा करना चाहता है, लेकिन उसे पता नहीं कि किस मार्ग का अनुकरण कर सफलता प्राप्त की जा सकती है और किस पर असफलता हाथ लग सकती है। मेरा मानना हैं कि जीवन का जो निर्णय हो, वह वैधानिक और वैज्ञानिक हो। तभी वह जीवन सार्थक हो सकता है। धर्म क्षेत्र में देखें। धर्म के क्षेत्र में लोग इसलिए जाना चाहते हैं कि उनके पूर्वजों ने घोषणा कर रखी है, इस संसार की जो विकरालता एवं संकट है, उनसे हटकर एक ऐसा मार्ग हमारे जीवन में है जिसे अध्यात्म के नाम से जानते हैं। अध्यात्म के मार्ग में जाने का मतलब हुआ कि वह व्यक्ति अपना सब कुछ परमात्मा को समर्पित कर देता है। इससे उस व्यक्ति की जवाबदेही समाप्त हो जाती है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि सर्वधर्मान् परितज्य, मामेकं शरणं ब्रज। अर्थात् तुम सारे विवादों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। क्या संभव है कि परमात्मा की शरण में आने के लिए कोई व्यक्ति अपने अहंकार और ऊंचाई को छोटा कर, सम बनकर खड़ा हो जाए। विकार तो व्यक्ति के मन में होता है और मनुष्य वहां तक नहीं पहुंच पाता। सुप्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद से एक बार पूछा गया कि जीवन की परिभाषा क्या है? उन्होंने बडे़ अद्भुत तरीके से कहा, 'ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न हो, इच्छा क्या पूरी हो मन की। एक दूसरे से न मिल सके, यह विडंबना है जीवन की।' समाज के किसी भी क्षेत्र में देखें, किसी व्यक्ति से पूछें कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है? उसका एक ही जवाब होगा कि सुख में रहना और खूब धन, 

लव' का केमिकल लोचा

आखिर 'लव' में ऐसा क्या है जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी मिस्ट्री माना गया है। अपने प्रेमी के लिए ललक ऐसी चीज है, जिसने वैज्ञानिकों को भी लम्बे वक्त तक हैरान किया है। प्यार करने वालों के बीच इस पागलपन का कारण जानने के लिए जाने कितनी खोजें हुई। अगर उन खोजों पर यकीन करें तो दो प्रेमियों की इमोशंस और उनके चेंज होने के पीछे जो असली कारण है, वह है शरीर में होने वाला केमिकल लोचा।
वैज्ञानिकों के अनुसार प्यार की अलग-अलग स्टेजेस जैसे इन्फैचुएशन, कडलिंग, अट्रैक्शन यहां तक कि बिट्रेयल के पीछे भी काम करते हैं कुछ खास केमिकल्स।
वैज्ञानिक मानते हैं कि आकर्षण असल में इन न्यूरोकेमिकल्स के वर्चुअल एक्सप्लोजन जैसा है। जिसके बाद आपको फील गुड होने लगता है। पीईए, एक केमिकल है जो नर्व सेल्स के बीच इन्फॉर्मेशन का फ्लो बढ़ा देता है। इस केमिस्ट्री में डोपामाइन और नोरिफिनेराइन नामक दो केमिकल्स भी बड़ा इंट्रेस्टिंग काम करते हैं। डोपामाइन हमें फील गुड का अहसास कराता है और नोरिफिनेराइन एड्रिनैलिन का प्रोडक्शन बढ़ा देता है। किसी को देखकर बढ़ने वाली हार्ट बीट इन कैमिकल्स की ही देन है, जिसे प्रेमी कुछ कुछ होना समझ बैठते हैं। ये तीनों कैमिकल्स कम्बाइन होकर काम करते हैं। इन्फैचुएशन जिसे इन जनरल लोग आपकी 'केमिस्ट्री' कहते हैं। यही कारण है कि नए प्रेमी खुद को हवा में उड़ता हुआ, बेहद ऊर्जावान सा फील करते हैं।
किसी के साथ कडल अप करने का मन बस यूं ही नहीं होता। इसके पीछे भी एक केमिकल है जनाब! ये है ऑक्सिटोसिन, जिसे कडलिंग केमिकल भी कहा गया है। वैसे तो ऑक्सिटोसिन को मदरहुड से भी संबंध किया जाता है लेकिन ये भी माना जाता है कि ये महिला और पुरूष दोनों को ज्यादा कूल और दूसरों की फीलिंग्स के लिए सेंसिटिव बनाता है। सेक्सुअल अराउजल में भी इसका खास रोल है। ऑक्सिटोसिन प्रोडक्शन ट्रिगर करने के पीछे इमोशनल रीजंस भी हो सकते हैं और फिजिकल भी। यानी अपने लवर की फोटो देखने, उसके बारे में सोचने से लेकर उसकी आवाज सुनने, उसके किसी खास अपीयरेंस तक कुछ भी आपकी बॉडी में ऑक्सिटोसिन का प्रोडक्शन बढ़ा सकता है। अगर प्रेमी फिजिकली प्रेजेंट हैं तो यही हार्मोन एक-दूसरे को गले लगाने और कडल करने के लिए उकसाता है।
इन्फैचुएशन कम होते ही केमिकल्स का एक नया ग्रुप टेकओवर कर लेता है। इसे क्रिएट करते हैं एन्डॉर्फिन्स। ये केमिकल्स पीईए जैसे एक्साइटिंग नहीं होते लेकिन ज्यादा एडिक्टिव और कूल करने वाले होते हैं। यही कारण है कि इन्फैचुएशन के बाद प्यार की अगली स्टेज यानी अटैचमेंट में इंटिमेसी के साथ-साथ ट्रस्ट, वॉ‌र्म्थ और साथ वक्त बिताने जैसी इमोशंस फील की जाती हैं। जितना ज्यादा लोग इन केमिकल्स के आदी हो जाएं वो उतना ही इनसे दूर नहीं रह सकते। यही कारण है कि लम्बे चलने वाले लव अफेयर्स या कोई खास रिश्ता टूटना आप बर्दाश्त नहीं कर पाते। इसके पीछे रीजन है इन केमिकल्स का लत लगना। अपने पार्टनर के दूर जाने पर उसे मिस करने के पीछे भी यही एंडॉर्फिन्स होते हैं।
प्रेमी के दूर जाने पर ये केमिकल्स बॉडी में कम होने लगते हैं और इनके आदी होने की वजह से आप अपने प्रेमी, या विज्ञान की भाषा में कहें तो इन हारमोन्स की कमी महसूस करने लगते हैं।

Saturday, January 22, 2011

..कहीं आप पापी तो नहीं



 यदि कोई यह जानने का इच्छुक है कि वह पापी है या नहीं तो यह कोई मुश्किल काम नहीं है। बस उसे हिमाचल प्रदेश के लाहुल-स्पीति जिले में स्थित त्रिलोकनाथ मंदिर में जाना होगा।
जिला मुख्यालय केलंग से करीब 40 किलोमीटर दूर तूंदे इलाके में स्थित त्रिलोकनाथ मंदिर के मुख्य द्वार पर पत्थर के दो खंभे हैं। मान्यता है कि ये खंभे स्वर्ग व नर्क का द्वार हैं। धर्म-अध्यात्म में गहरी आस्था रखने वाले लोगों का विश्वास है कि जो व्यक्ति खंभे को आसानी से पार कर जाता है, उसने पुण्य किए हैं और वह पापी नहीं है। वहीं जो आदमी खंभे में फंस जाता है, वह पापी है। मान्यता के अनुसार जो पापी नहीं है, वह मरने के बाद स्वर्ग जाएगा और जो आदमी खंभे में फंस जाता है, वह नर्क भोगेगा। यही परीक्षण करने के लिए कई श्रद्धालु हर वर्ष त्रिलोकनाथ मंदिर आते हैं। सत्य व धर्म की राह पर चलने वाला व्यक्ति चाहे वह पतला हो या मोटा, खंभों के बीच में से आसानी से निकल जाता है। अविश्वसनीय रूप से कई बार पतले व्यक्ति भी खंभों के बीच फंस जाते हैं। ऐसे लोग बुरे कर्मो को त्यागने का प्रण लेकर घर लौटते हैं।
हिंदू-बौद्ध नवाते हैं शीश
मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि इसमें प्राचीन काल से हिंदू व बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले लोग एक साथ अपनी-अपनी पूजा पद्धति से शीश नवाते हैं। हिंदुओं का दावा है कि मंदिर में मूर्ति शिव की है। वहीं, बौद्ध धर्म के श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान अवलेकितेश्वर को समर्पित है। मंदिर के पुजारी लामा नोरसेल ने बताया कि उन्हें यहां रहते करीब 20 साल हो गए हैं। उन्होंने खंभों में ऐसे कई लोगों को अटकते देखा जो काफी दुबले-पतले थे। जबकि कई मोटे लोग खंभों के बीच से आसानी से गुजर जाते हैं।
दूरदराज से आते हैं श्रद्धालु
स्थानीय निवासी शेर सिंह, सुरेंद्र ठाकुर, अमर लाल आदि ने बताया कि दूरदराज इलाकों से श्रद्धालु खंभे पार करने आते हैं। दिल्ली से आए नवविवाहित जोडे निधि सागर व सुशांत ने बताया कि जब वे खंभे को पार कर रहे थे, तो अजीब-सा डर लग रहा था। निधि ने बताया कि वह खंभे को पार करते समय फंस गई जबकि वह काफी पतली हैं। इसके बाद उन्होंने प्रण किया कि वह अब किसी के साथ बुरा व्यवहार नहीं करेंगी

प्रेम और मोह




परमशक्तिमें ही परमशक्ति का विश्वास होना वास्तविक विश्वास है। इसलिए जब तक परमशक्तिका ज्ञान न हो तब तक उसमें विश्वास नहीं होता। बिना विश्वास के प्रीति अर्थात प्रेम नहीं होता। जिस प्रकार परमशक्तिके बिना किसी वस्तु में परमशक्ति का विश्वास रखना धोखा है,उसी प्रकार उस वस्तु से प्रेम करना भी भूल अथवा मोह है। मोह-रहित प्रेम से परमशक्तिकी प्राप्ति होती है, क्योंकि उस दिव्य शक्ति के अभाव में प्रेम हो ही नहीं सकता। एक जीवधारीके अंत:करण में परमपिता परमात्मा से मिलने की उत्कट् इच्छा उत्पन्न होती है। वह तीव्र इच्छा ही प्रेम है। वह प्रेमी प्रेम के रूप की प्राप्ति करना चाहता है, किंतु जब तक प्रेमरूपईश्वर न मिले, वह प्रेम किससे करे, कैसे करे, कैसे उसकी इच्छा पूर्ण हो? वह अपने ईष्ट को ढूंढताहुआ, जब देखता है कि लोग उस परमेश्वर के दर्शन करने के लिए मंदिरों में जाते हैं। भगवान को स्नान कराते हैं, उनको भोग लगाते हैं, तथा उनका गुणगान करते हैं। वह चाहता है कि भगवान उससे वार्तालाप करें और उनके वचनामृतमें अपनी प्यास बुझाएं।
जब वह सुनता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने नर-तन धारण कर गोकुल-वृंदावन में अपने भक्तों को लीला दिखाई थी; राम ने अयोध्या में अवतार लिया था तब वह उन स्थानों पर जाता है किंतु उसे मन की शांति नहीं मिलती। किंतु कहीं भी दर्शन नहीं प्राप्त कर पाता। कभी रोता है तो कभी अपने ईश्वर का आह्वान करता है। वास्तव में जो मनुष्य जिससे प्रेम करना चाहता है, उसके रूप को जाने बिना उसे वह प्रेम नहीं कर सकता। यदि होता भी है तो वह प्रेम नहीं बल्कि मात्र मोह है। प्रेम का परिणाम आनन्द और मोह का परिणाम दु:ख होता है। प्रेम अटल-अविनाशी और मोह नाशवान होता है, मोह के भाव का अभाव हो जाता है। यही प्रेम और मोह की पहचान है। अंदर का मोह तभी नष्ट होता है जब वह प्राणी परमपुरुष में मन लगाता है। वही सच्चा वैरागी है और वही सच्चा साधु है, जिसका मन जितना परमेश्वर की ओर लगता जाता है उतना ही सांसारिकता की ओर से हटता जाता है। जब संसार के साथ राग होता है तब उसे मोह कहते हैं और जब वही राग जगदीश्वरसे हो जाता है तब वह प्रेम की कोटि में रेखांकित होने लगता है।


prafull singh

ऐसी वाणी बोलिए.........


बेजामिनफ्रैंकलिनने अपनी सफलता का कारण बताते हुए कहा था, मैंने तय किया है कि किसी भी व्यक्ति के बारे में बुरा नहीं बोलूंगा और जितना भी बोलूंगा, वह उस व्यक्ति की अच्छाइयों के बारे में ही होगा। वाणी के इसी संयम को अध्यात्म में वाचिक तप कहा जाता है अर्थात अपनी वाणी पर कठोर वचनों को न आने देने का प्रयास। श्रीमद्भगवद्गीतामें तीन प्रकार के तप गिनाए गए हैं- शारीरिक तप, वाचिक तप और मानसिक तप।
वाचिक तप के बारे में उल्लेख है, उद्वेग उत्पन्न न करने वाला वाक्य बोलना, प्रिय, हितकारकऔर सत्य वचन बोलना और स्वाध्याय करना वाणी का तप कहलाता है।
हमारे जीवन में वाणी के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसको वश में करने से व्यक्ति बहुत ऊंचा उठता है। इसके विपरीत अनियंत्रित वाणी वाले व्यक्ति को अमूमन जीवन में सफलता नहीं मिल पाती। जब व्यक्ति अपनी वाणी से किसी को ठेस नहीं लगाता और सदैव मीठा बोलता है, उसके इष्ट-मित्रों का दायरा अधिक होता है और लोगों के सहयोग व समर्थन के कारण वह अधिक शक्तिशाली बनकर उभरता है। इसके विपरीत कटु वचन बोलने वाला जीवन में अकेला पडता चला जाता है। सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य के लिए वाचिक तप का अत्यंत महत्व है।
गीता में कर्म के तीन साधन बताए गए हैं, जिनमें एक साधन वाणी भी है। ऋग्वेद के एक मंत्र का आशय है कि जिस प्रकार छलनी में छानकर सत्तू को साफ करते हैं, वैसे ही जो लोग मन, बुद्धि अथवा ज्ञान की छलनी से छान कर वाणी का प्रयोग करते हैं, वे हित की बातों को समझते हैं अथवा शब्द और अर्थ के संबंध ज्ञान को जानते हैं। जो बुद्धि से शुद्ध कर के वचन बोलते हैं, वे अपने हित को भी समझते हैं और जिस को बात बता रहे हैं, उसके हित को भी समझते हैं। सोच-समझकर शब्दों का उच्चारण या बोलने में ही, कहने और सुनने वाले का हित-भाव छिपा हुआ है। वाणी में आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के ऐश्वर्य निहित रहते हैं।
मधुरता से कही गई बात हर प्रकार से कल्याणकारी होती है। परंतु वही बात कठोर व कटु शब्दों में बोली जाए, तो एक बडे अनर्थ का कारण बन जाती है। आज के समय में, जब कठोर वाणी के कारण रोड रेजजैसे अनेक अपराध बढ रहे हैं, ऐसे समय में वाणी का संयम बहुत ही जरूरी है। आज के आपाधापी के समय में यदि हम सदा मधुर, सार्थक और चमत्कारपूर्ण वचन नहीं बोल सकते, तो कम से कम वाणी में संयम का हमारा प्रयास अवश्य होना चाहिए।
महात्मा विदुर ने कहा है कि कटु वचन रूपी बाण मुख से निकल कर दूसरों के मर्मस्थलोंको घायल कर देते हैं, जिसके कारण घायल व्यक्ति दिन-रात दुखी रहता है। उनका परामर्श है कि ऐसे कटु वाग्बाणोंका त्याग करने में अपना और औरों का भला होता है। बाणों से हुआ घाव भर जाता है, कुल्हाडे से काटा गया वृक्ष फिर उग जाता है, लेकिन वाणी से कटु वचन कहकर किए गए घाव कभी नहीं भरते। इसलिए जो मनुष्य कठोर वचन बोलता है, वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है, दूसरों के बारे में नहीं। स्वार्थी नहीं, बल्कि परमार्थी बनने के लिए आपको कठोर वचनों को छोडना ही पडेगा।
मनुस्मृति में मनुष्य के जीवन के लिए जरूरी दस बातें बताई गई हैं, जिनमें पहली जो चार बातें हैं, वे बोलने के संबंध में ही हैं। जिनमें कहा गया है कि हम कठोर न बोलें। कोई भी बात मधुरता से, मृदुलतासे और अपनी वाणी में अपने हृदय का रस घोल कर कहनी चाहिए। कठोर वाणी का तो पूरी तरह परित्याग करना चाहिए। वह मनुष्यों में सबसे अधिक अभागा है, जो कठोर शब्दों द्वारा लोगों के मर्मस्थलोंको विदीर्ण करता है।
हमारे मनीषियोंने बार-बार कहा है कि जो व्यक्ति दूसरों के प्रति कडे शब्दों का व्यवहार करता है और पर-निंदा करता है, वह ऐसा पापाचरणकरता हुआ शीघ्र ही विपत्तिायोंमें फंस जाता है। इसलिए न तो किसी को अपशब्द कहे, न दूसरों का अपमान करें और न दुष्ट लोगों की संगति करें। रूखी, कठोर व दूसरों को पीडा पहुंचाने वाली वाणी का त्याग होना चाहिए, क्योंकि मनुष्य की वृद्धि और विनाश उसकी जिज्जाके अधीन होते हैं। मनुष्य का मान-अपमान, उसका आदर-अनादर, उसकी प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा सब उसकी जिज्जाके वशीभूत होते हैं। वाक-कुशलता बुद्धिमान का एक प्रशंसनीय लक्षण होता है। विदुर ने लक्ष्मी व यश दिलाने वाले सात लक्षण बताए हैं, जिनमें एक मधुर वाणी भी है। जिस मनुष्य में यह गुण होता है, वह अपने विरोधियों और शत्रुओं को भी मित्र बना लेता है। कटु वचन नासूर की तरह प्रेम को खा जाते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है, रोष न रसना खोलिए, बरुखोलियतलवार.सुनत मधुर परिनामहित, बोलियवचन विचार.। अर्थात भले ही तुम तलवार खोलो, परंतु रोष में आकर अपनी जिज्जामत खोलो। जो बात सुनने में मधुर हो और परिणाम में हितकारी हो, ऐसे ही वचन विचारपूर्वक कहने चाहिए। वाणी का उचित प्रयोग ही सुखकारी होता है। जिन लोगों के मुख पर प्रसन्नता होगी, हृदय में दया होगी, वाणी में मधुरता होगी, कत्र्ताव्यमें परोपकार होगा, वे सभी के लिए वंदनीय होते हैं।
मीठे वचनों का सुख लाभकारी है। हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हमारा जीवन ज्ञान, निर्मलता, शक्ति व शुभ वाणी से अलंकृत हो। हम जिज्जापर संयम साध लें।


prafull singh

Friday, January 21, 2011

तौहीन-ए-मोहब्बत


गुलशन की फक़त फूलों से नहीं काटों से भी ज़ीनत होती है,
जीने के लिए इस दुनिया में गम की भी ज़रूरत होती है.

ऐ वाइज़-ए-नादां करता है तू एक क़यामत का चर्चा,
यहाँ रोज़ निगाहें मिलती हैं यहाँ रोज़ क़यामत होती है.

वो पुर्शिश-ए-गम को आए हैं कुछ कह ना सकूँ चुप रह ना सकूँ,
खामोश रहूं तो मुश्किल है कह दूं तो शिकायत होती है.

करना ही पड़ेगा ज़ब्त-ए-अलम पीने ही पड़ेंगे ये आँसू,
फरियाद-ओ-फूग़ान से ऐ नादां तौहीन-ए-मोहब्बत होती है.

जो आके रुके दामन पे ‘सबा’ वो अश्क़ नहीं है पानी है,
जो अश्क़ ना छल्के आँखों से उस अश्क़ की कीमत होती है









 prafull singh

तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा

ओ कल्पव्रक्ष की सोनजुही..
ओ अमलताश की अमलकली.
धरती के आतप से जलते..
मन पर छाई निर्मल बदली..
मैं तुमको मधुसदगन्ध युक्त संसार नहीं दे पाऊँगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा.
तुम कल्पव्रक्ष का फूल और
मैं धरती का अदना गायक
तुम जीवन के उपभोग योग्य
मैं नहीं स्वयं अपने लायक
तुम नहीं अधूरी गजल सुभे
तुम शाम गान सी पावन हो
हिम शिखरों पर सहसा कौंधी
बिजुरी सी तुम मनभावन हो.
इसलिये व्यर्थ शब्दों वाला व्यापार नहीं दे पाऊँगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा
तुम जिस शय्या पर शयन करो
वह क्षीर सिन्धु सी पावन हो
जिस आँगन की हो मौलश्री
वह आँगन क्या व्रन्दावन हो
जिन अधरों का चुम्बन पाओ
वे अधर नहीं गंगातट हों
जिसकी छाया बन साथ रहो
वह व्यक्ति नहीं वंशीवट हो
पर मैं वट जैसा सघन छाँह विस्तार नहीं दे पाऊँगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा
मै तुमको चाँद सितारों का
सौंपू उपहार भला कैसे
मैं यायावर बंजारा साँधू
सुर श्रंगार भला कैसे
मैन जीवन के प्रश्नों से नाता तोड तुम्हारे साथ सुभे
बारूद बिछी धरती पर कर लूँ
दो पल प्यार भला कैसे
इसलिये विवष हर आँसू को सत्कार नहीं दे पाऊँगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा
तुम मुझको करना माफ तुम्हे मैं प्यार नहीं दे पाऊँगा





prfaull singh

किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है
हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

हकीकत धरती की

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे देख,
पर अंधेरा देख तू आकाश के तारे देख।

एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें देख।

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन खौफ़ के मारे देख।

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें देख।

ये धुंधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें देख।

राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई,
राख में चिनगारियां ही देख अंगारे देख।

जाड़ों में सुबह के मंज़र सितारे धूप पहनकर निकलने लगते हैं

पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैं
ज़मीं जहाँ भी खुले घर निकलने लगते हैं
मैं खोलता हूँ सदफ़ मोतियों के चक्कर में
मगर यहाँ भी समन्दर निकलने लगते हैं
हसीन लगते हैं जाड़ों में सुबह के मंज़र
सितारे धूप पहनकर निकलने लगते हैं
बुरे दिनों से बचाना मुझे मेरे मौला
क़रीबी दोस्त भी बचकर निकलने लगते हैं
बुलन्दियों का तसव्वुर भी ख़ूब होता है
कभी कभी तो मेरे पर निकलने लगते हैं
अगर ख़्याल भी आए कि तुझको ख़त लिक्खूँ
तो घोंसलों से कबूतर निकलने लगते हैं